Saturday, 22 November 2014

Shiva and Rudra are synonymous with each other mutually. Because it is called Shiva Rudra Rutm-grief Km, Dravyti-Nashytitirudra: That's naive All sorrows are destroyed. We've made our sins according to the Scriptures as our woes are due. ....

Shiva and Rudra are synonymous with each other mutually. Because it is called Shiva Rudra Rutm-grief Km, Dravyti-Nashytitirudra: That's naive All sorrows are destroyed. We've made our sins according to the Scriptures as our woes are due. Rudraarcn and illegal activity and felony Rudraabhisek our horoscopes are also burnt to death and the rise of Shiwatw seeker and receive a devotee of Lord Shiva and all his desire Shubashirwad are full. It is said that only the gods to worship Rudra Sadashiv automatically becomes.
Rudrahridayopanisd Shiva is said about that-
Srwdewatmko Rudra: Survey Deva: Shivatmka:
Namely: - in the spirit of the gods and the god Rudra Rudra present to the soul.
To meet the diverse desires of our scriptures Rudraabhisek sake of worship and liturgical material has told several substances. Rudraabhisek seeker with desire to worship and various different methods. Accordingly to meet a particular desire is Rudraabhisek worship materials and method.
There are various advantages of worship Rudraabhisek
• The rain water is anointed.
• Rudraabhisek from incurable diseases Kushodk to cool.
• Building in-vehicle Rudraabhisek yogurt.
• To Lakshmi Rudraabhisek from sugar cane juice to achieve.
• honey and ghee to increase funding to the consecration.
• pilgrimage to the consecration of the water leads to salvation.
• eliminating the disease is to be anointed with perfumes found water.
• son of the milk and the milk of the babies born dead and to Rudraabhisek.
• Rudraabhisek qualified leads to children and scholars.
• Soft Water for peace of fever / holy water to the Rudraabhisek.
• sahasranAma-mantras Rudraabhisek pronunciation section of the grease is the breed.
• diabetes disease becomes Dugdhabhisek peace.
• sugar found in milk is learned that Jdbuddhi to Abhishek.
• mustard oil to anoint the enemy is defeated.
• The consumption of honey anointed by (TB) is off.
• eliminating sins Rudraabhisek of honey to be wished.
• cow milk and ghee and health is derived from the consecration.
• son Abhishek Kamnawale person to sugar mixed with water.
Abhishek is simply that the water itself. But special occasion or Monday, dusk and during Shivaratri festival spells etc. got milk or other milk or the milk is anointed. Special worship milk, curd, ghee, honey and sugar mixed with individual or all of Panchamrita is anointed. Mechanisms for disease prevention legislation to anoint other various items. Thus, from various materials intended to Shiva wished to meet Abhishek is lawfully.
There is no doubt that any old regular worshiped Shiva anoint the fruit is very good. But the mercury should be anointed Shiva's good to get results very soon wonderful.
Rudraabhisek receive the fruits very soon. Scholars in the Vedas it is sincere praise. In mythology, it is associated details of many stories.
Vedas and Puranas Rudraabhisek have been disclosed about the ten-headed Ravana, his anointed Shiva was cut and the ends of the blood ritual was dedicated to the fire. He was the Trilokjayi. The Shiv Ling Bshmasur Aansuo anoint your eyes so he became eligible for the gift of God.
Dates of Rudraabhisek

Krishnpaksh the Pratipada, Chaturthi, Panchami, eighth, Ekadashi, twelfth, moon, Dwitiya of Shuklpaksh, Panchami, Shashthi, ninth, twelfth, Thrayodashi dates to Abhishek Aishwarya receipt and receive child well-being.
Kalsarpa yoga, Grihklesh, loss of business, interruption of education of all work to remove barriers Rudraabhisek is fruitful for your intended accomplishment.
A desire to be the abode of Shiva in Rudraabhisek must consider ritual is successful and the desired pattern is obtained fruit. Krishnpaksh Pratipada of each month, eighth, and ninth day of the moon and Shuklpaksh Dwitiya of Lord Shiva with Goddess Gauri are available Riches from the date that the Rudraabhisek.
Krishnpaksh the Chaturthi, Ekadashi and Shuklpaksh twelfth of the festival dates and are Lord Shiva and his grace to Mount Kailash is in the family room-Tue.
Krishnpaksh the festival, twelfth and Shashthi of Shuklpaksh Thrayodashi dates and traveling around the world is riding on Nandi Mahadev. Therefore intended to Rudraabhisek proves these dates.
Krishnpaksh the Saptami, chaturdasi and Pratipada of Shuklpaksh, eighth, full moon god Mahakala are buried in the cemetery. Therefore, to meet these dates to be a wish to be called upon in Rudraabhisek which disturbed his meditation may Abhisekkrta evil.

Dwitiya of Krishnpaksh, ninth and Shuklpaksh Mahadeva gods in the House of Dashami tritiya and hear their problems. Pain or suffering on these dates to get the Resolutions ritual.
Krishnpaksh the Tritiya, Sadashiv Kreedart Dashami and Shuklpaksh live in the dative and Ekadashi. These dates provide Resolutions Rudraarcn child suffer.
Krishnpaksh the Shashthi, Thrayodashi and Shuklpaksh Rudradev eat in the Saptami and chaturdasi. These dates are suffering Rudraabhisek mundane been wished.
Jyorthyling and Shivaratri-dog-in-area and pilgrimage, etc. Prwo Monday of Shravan habitat regardless of Shiva can also be Rudraabhisek. Indeed, early pleased Shiva Lingam and anointed Ashutosh seeker makes his minions and their many problems automatically expire. So we can say that all the sins of man-heating Rudraabhisek are erased. Shrishti subject of Brahma himself has said that we have anointed themselves Sacshat Mahadev is the anointed receive. No such thing in the world, prosperity, happiness is not getting us Rudraabhisek or may not get.

रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है। Rudraabhisek the well-being is available.
शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि-
सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:
अर्थात् :- सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।
हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है।
रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-
• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।
• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।
• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।
• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।
ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है।
रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की गयी है। पुराणों में तो इससे सम्बंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है।
वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में तो बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था। जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया। भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।
रुद्राभिषेक करने की तिथियां

कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।
किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है।
कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है। अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।
कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।
कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।
कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं। इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।
ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक करने या करवाने से प्राप्त नहीं हो सकता है।

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